Radha Krishna Vani ( 1 To 20)

Our favourite show Radhakrishn and our favourite actor and actress Sumedh Mudgalkar and Mallika Singh .This video is all about Radhakrishna Vani .Your can use this video on your whatsapp status.Your can share this videos on your social media.

Radha Krishna Vani ( 1 To 20)


Radha Krishna Vani ( 1 To 20) 

Radha Krishna Vani (1) 

मटकी तो देखे ही होंगे आप? जिसमें जल रखा जाता है, जल जो शुद्ध रहता है, शीतल रहता है, जल जो प्यास बुझाता है।

सोचिये, यदि मटकी की माटी ठीक ना हो, यदि इसे भली प्रकार रौंधा ना गया हो, आकार देकर इसे अग्नि में ठीक से पकाया ना गया हो तो क्या होगा?

यही  मन के साथ भी होता है। क्योंकि यदि प्रेम ये जल है तो इसकी मटकी है मन, मन रुपी पात्र में यदि विश्वास की माटी ना हो, यदि आंसुओं से उसे भिगोया ना गया हो, समय रुपी कुम्हार ने उसे आकार ना दिया हो और परीक्षा की अग्नि में उसे पकाया ना गया हो तो प्रेम मन में नहीं ठहर सकता।


तो यदि प्रेम को पाना है तो हृदय पर काम करना होगा और मन से कहना होगा! 
                                     राधे-राधे

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (2)

आप अपने पास आस-पास वृक्ष, पौधे, पुष्प देखे होंगे ? है ना सुन्दर? क्योंकि आपने इन्हें देखा है। इसी प्रकार जब प्रेम की बात आती है लोग किसी का मुख स्मरण कर लेते है।

ऐसी आँखे, वैसी मुस्कान, तिरछी भृकुटि, घने बाल , पर क्या यही प्रेम का अस्तित्व है?

नहीं, ये उस शरीर का अस्तित्व है जिसे हमारी आँखों ने देखा और हमने स्वीकार कर लिया। लेकिन प्रेम, प्रेम भिन्न है, प्रेम उस वायु की भांति है जो हमें दिखाई नहीं देता, किन्तु वही हमें जीवन देता है।

संसार किसी स्त्री को कुरूप कह सकता है, क्योंकि वो उसे अपनी तन की आँखों से देखता है। लेकिन संतान उसी माता को संसार में सबसे सुन्दर समझता है, क्योंकि वो प्रेम भाव से देखता है।

तन की आँखों से देखोगे तो वैसे ही पहचान नहीं पाओगे जैसे श्री राधा श्रीं कृष्ण पहचान नहीं पाई।थी इसलिए यदि प्रेम को पाना है तो मन की आँखे खोलो और प्रेम से कहो! 
राधे-राधे

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (3)

किसी भी वस्तु को बांध सकने के लिए किसी बंधन का, किसी रस्सी का होना आवश्यक है। परन्तु इस रस्सी को बांधने की शक्ति कौन देता है? वो धागे जिनसे जुट कर ये रस्सी बनी है।

अब बताइये, प्रेम को किस रस्सी से स्वयं तक बांधेंगे आप? प्रेम बनता है “विश्वास से” और विश्वास की डोरी के धागे “सत्य के धागों” से बुने जाते है।

अब Question ये उठता है कि सत्य क्या है? वो जो हमने देखा, वो जो हमने सोचा? नहीं, हमारा सत्य वो है जिस पर हमने विश्वास कर लिया और विश्वास वो जिसे हमने सत्य समझ लिया।

वास्तव में “सत्य” और “विश्वास” एक ही सिक्के के दो पहलू है। जहां सत्य नहीं वहां विश्वास की नींव नहीं और जहां विश्वास नहीं वहां सत्य अपना धरातल खो देता है।

तो यदि किसी का सत्य जानना है तो विश्वास कीजिये, प्रेम का धरातल बन जायेगा और मन प्रसन्न होकर बोलेगा! 
राधे-राधे


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (4)

जब भी प्रेम की बात आती है हम सबसे पहले मन में एक हीरो और एक हिरोइन का चित्रण कर लेते है, क्यों आपके साथ भी यही होता है ना? पर, क्या प्रेम केवल हीरो -हीरोइन के आकर्षण का बंधन है?

नहीं, प्रेम तो परिवार से हो सकता है, माता-पिता, भाई-बहन से हो सकता है, सखा-मित्रों से हो सकता है, देश और जन्म-भूमि के लिए हो सकता है, मानवता के लिए हो सकता है, किसी कला के लिए हो सकता है, इस प्रकृति के लिए हो सकता है। पर प्रेम कभी उस पन्ने पर नहीं लिखा जा सकता जिस पर पहले ही बहुत कुछ लिखा हो।

जैसे एक भरी मटकी में और पानी आ ही नहीं सकता। यदि प्रेम को पाना है तो मन को खाली करना होगा। अपनी इच्छाएं, अपना सुख सब त्याग कर समर्पण करना होगा।

अपने मन से व्यापार हटा दो तभी प्यार मिलेगा और मन प्रसन्न होकर बोलेगा! 
 राधे-राधे 

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (5) 

प्रेम, प्रेम विधाता की सबसे सुन्दर कृति है, परन्तु हर कृति हो संभालना पड़ता है।

आप किसी मूर्ति को देख लीजिये, जब कलाकार ने उसे रचा तब वो बहुत सुन्दर थी परन्तु इसके पश्चात इसे संभाला नहीं गया, उसके स्वामी ने उसकी देखभाल का कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया और अब, अब मूर्ति असुन्दर लगने लगी है।

इसी प्रकार केवल कह देने से प्रेम, प्रेम नहीं हो जाता। इसके लिए आपको अपने कर्तव्यों को पूर्ण करना होगा। तो देश की सुरक्षा, परिवार और संबंधियों की सुरक्षा, संतान को संस्कार, जीवन साथी का आभास, ये कर्तव्य जब तक नहीं निभाओगे, प्रेम से दूर होते जाओगे।

यदि प्रेम का अमृत पाना है तो कर्तव्य की अंजलि बनानी होगी और मन से कहना होगा राधे-राधे! 


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (6) 

प्रेम संसार का सबसे पवित्र बंधन है, पर सच पूछो तो ये बंधन से मुक्ति है, स्वतंत्रता है। नहीं समझे? समझाता हूँ , यदि कोई आपका प्रेम ठुकरा दे, यदि कोई आपका प्रेम समझ ही ना पाए तो क्या होगा?

कुछ उदास हो जायेंगे, कुछ छल करके प्रेम पाना चाहेंगे तो कुछ बलपूर्वक प्रेम पर अधिकार करना चाहेंगे। किन्तु ये आवश्यक नहीं कि जिससे आप प्रेम करते हो उसे भी आपसे प्रेम हो।

क्योंकि प्रेम कोई वस्तु नहीं, ना राज्य है, ना धन जिसे आप बल से अपने वश में कर सको। प्रेम वो शक्ति है जो आपके लिए हर बंधन तोड़ सकती है किन्तु स्वयं किसी बंधन में नहीं फंसती। तो जिससे भी आप प्रेम करते हो उसे स्वतंत्र छोड़ दीजिये।

क्योंकि स्वतंत्रता ही वो भाव है जो जीव को सबसे अधिक प्रिय है। प्रेम सच्चा होगा तो उसे अवश्य समझ में आएगा, तब तक के लिए निस्वार्थ भाव से प्रेम कीजिये, स्वार्थ हट जायेगा तो प्रेम आ ही जाएगा और मन प्रसन्न होकर बोलेगा राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (7)

“भय”, भय सबको होता है चाहे वो पशु हो, पक्षी हो या मनुष्य। वास्तविकता में मनुष्य भय को अपने साथ लेके ही जन्म लेता है। तो इस भय से भय कैसा ? यदि भय बुरा भाव होता तो क्या इसे हम अपने साथ लेके जन्म लेते?

वास्तविकता में भय हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। अब देखिये, जीवन जाने का भय आपसे स्वयं की सुरक्षा करवाने का प्रयास करता है। अपमान का भय सदाचार की ओर बढ़ाता है।

किसी प्रिय को खो देने का भय, उसके लिए कर्तव्य पालन करने को प्रेरित करता है। किन्तु ये भय, ये भय बुरा तब हो जाता है जब आप इसे अपने ऊपर हावी हो जाने देते है। इसके लिए कुछ प्रयास नहीं कर पाते।

इसलिए यदि इस भय को उपयोग में लाना है, आपको स्वयं इस भय के ऊपर हावी हो जाना होगा। तो तोड़ दीजिये भय की सीमाएं, अपनी आत्मा को छोड़ के किसी ओर के समक्ष सर मत झुकाइये और स्मरण रखिये जब अंधकार से डरना छोड़ दोगे तभी दीपक बन कर प्रकाश दे पाओगे। राधे-राधे!



------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (8)


मनुष्य का स्वभाव है “कमाना, संग्रह करना” फिर चाहे वो धन हो, नाते हो, संबंध हो या हो प्रसन्नता, परन्तु क्या आपने कभी सोचा है? नियति ने ये संग्रह करने की प्रकृति मनुष्य में क्यों डाली?

एक बीज से पौधा पनपता है, उसके भोजन से फल संग्रहित होता है क्यों? इसलिए ताकि वृक्ष उसे स्वयं खा सके? नहीं, बल्कि इसलिए ताकि वो भूखे जीवों में बाँट सके। अब आप पूछेंगे कि इसमें वृक्ष का क्या लाभ?

लाभ है, क्योंकि जो बांटता है वो मिटता नहीं। जो फल ये जीव खाते है वो उसके बीजों को वातावरण में बिखेर देते है जिससे जन्म लेते है नए वृक्ष, उसकी जाति, उसका गुण, उसकी मिठास अमर हो जाती है।

इसलिए स्मरण रखियेगा अमीर होने के लिए एक-एक क्षण संग्रह करना पड़ता है। किन्तु अमर बनने के लिए एक-एक कण बांटना पड़ता है। राधे-राधे!



------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (9)


संसार में सबसे बड़ी शक्ति क्या है? अब आपमें से कुछ कहेंगे “शस्त्र की”, कुछ कहेंगे “शास्त्र की”, कोई कहेगा “बुद्धि की” तो कोई कहेगा “बल की” किन्तु ये सब अधूरे है।

संसार में सबसे बड़ी शक्ति है “मित्रता” यदि सच्ची मित्रता प्राप्त हो जाये तो वही सबसे बड़ा धन है। जब आप कठिनाइयों में होंगे तो मित्रता शस्त्र बन कर सहायता करेगी।  मार्ग भटक जाओगे तो मित्रता शास्त्र बन कर आपको राह दिखाएगी। षड्यंत्र में फंस जाओगे तो बुद्धि बन कर बाहर निकालेगी। अकेले हो जाओगे तो ममता बन कर साथ निभाएगी।

तो यदि इस संसार में कुछ कमाना है तो धन नहीं, मित्रता कमाओ और स्मरण रखियेगा यदि इस संसार में मित्र बनाना आपकी सबसे बड़ी दुर्बलता है तो आप इस संसार के सबसे शक्तिशाली प्राणी है। राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (10) 

जब से मनुष्य जाति का अस्तित्व बना है तभी से युद्ध भी अस्तित्व में आया। युद्ध जो कभी धन का द्वन्द बन के सामने आता है, तो कभी सुरक्षा का हथियार बन कर, कभी विजय की भूख के लिए, तो कभी पराजय टालने के लिए।

किन्तु वास्तविकता तो यही है कि यदि आपको आगे बढ़ना है तो बाधाओं से युद्ध तो करना होगा। परन्तु युद्ध के लिए सज्ज रहना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना महत्त्वपूर्ण है ये समझना कि “युद्ध को टाला कब जा सकता है।”

क्योंकि सबसे सफल युद्ध वही होता है जो कभी लड़ा ही ना जाए। आप युद्ध में विजय प्राप्त करके स्वयं का मान तो बढ़ा लोगे, किन्तु अपना बल खो दोगे।

इसलिए जहां तक हो सके युद्ध को टालो, इस शक्ति को संग्रहित रखो। ताकि जब ये युद्ध धर्म बन के सामने आये आप उससे पूरे बल के साथ लड़ सको। राधे-राधे!

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (11)


“मन” बड़ी ही विचित्र कृति है ये मन, शरीर के किस अंग में बसता है कोई नहीं जानता। किन्तु सम्पूर्ण शरीर इस मन की इच्छा साकार करने के लिए प्रयास करता रहता है।

अब यदि मन कुछ खाने का करे तो व्यक्ति उसकी इच्छा साकार करने का माध्यम ढूंढता रहता है। अब यदि मन किसी को शत्रु समझ ले तो व्यक्ति उसे नष्ट करने का हर सम्भव प्रयास करता है। अब यदि मन किसी से प्रेम करे तो उसकी प्रसन्नता के लिए हर सीमा लांघने के लिए सज्ज रहता है।

परन्तु जीवन सुखद हो इसके लिए ये आवश्यक है कि मन खाली रहे, बांसुरी की भांति। भीतर कुछ भी नहीं, ना राग है, ना द्वेष, तब भी तार छेड़ने पर स्वर निकलता है।

इसी प्रकार मन को भी भावनाओं से मुक्त रखना आवश्यक है। स्मरण रखिये, मन में कुछ भर कर जियोगे तो मन भर के जी नहीं पाओगे। 
राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (12)


एक पिता के लिए उसकी संतान गर्व है, उसका अहंकार है और संतान के लिए उसके पिता उसका “आदर्श”, उसकी “प्रेरणा”। बिना कहे पिता संतान की हर इच्छा समझ जाता है और उसे पूरी करने की चेष्टा करता है।

दूसरी ओर संतान – सदैव प्रयास करता है कि अपने माता-पिता को गर्वित करता रहे। किन्तु ये बंधन है, एक स्थान पे आके टूट जाता है। तब जब संतान स्वयं की इच्छा से अपना जीवन साथी चुनना चाहे, क्यों?

कारण है – संवाद की कमी। जब बात आती है संतान के विवाह की तो माता-पिता सोचते है कि इसमें संतान से पूछना क्या? हम उसके लिए कुछ अनुचित तो चाहेंगे नहीं और संतान का ये मानना होता है कि उसका भविष्य चुनना उसका अधिकार है।

दोनों आपस में दुखी रहते है, किन्तु बात कोई नहीं करता। होना ये चाहिए कि माता-पिता को स्नेह के साथ संतान की इच्छा समझ लेनी चाहिए और संतान को उसी विश्वास के साथ माता-पिता को विश्वास में ले लेना चाहिए।

एक बार संवाद करके देखिये, वर्तमान और भविष्य दोनों ठीक हो जायेंगे और मन प्रसन्न होकर बोलेगा राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (13)

हम में ऐसा कोई नहीं होगा जिसने वृक्षों को नहीं देखा, वृक्षों पर इन पक्षियों का ना देखा, इनके घोंसलों को ना देखा, इन पक्षियों को अपने छोटे-छोटे बच्चों को भोजन कराते ना देखा, संसार का सबसे ममत्त्व वाला दृश्य होता है।

चिड़िया दूर से अपनी चोंच में दाना भर कर लाती है, स्वयं भोजन करने में असक्षम संतान की चोंच में डालती है, स्वयं भूखी रहती है, निस्वार्थ, निश्छलता और जब संतान के पंख निकल आते है वो उसे उड़ना सिखाती है और उसके पश्चात उसे स्वतंत्र कर देती है अपना जीवन जीने के लिए, इस आकाश में उड़ान भरने के लिए और हम मनुष्य क्या करते है जिस संतान को हम पंछी की भांति पालते है, उसके पंख निकलते ही हम उसे बाँध देते है, ये सोच के कि कहीं वो दूर उड़ कर ना चली जाये।

ऐसा नहीं है कि इस स्थिति में माता-पिता को संतान से प्रेम नहीं है, अवश्य है। किन्तु इसमें प्रेम पर मोह भारी पड़ जाता है। जो स्वयं अपने और संतान के बीच में बाधा बन जाता है हम ये भूल जाते है कि हम केवल जन्मदाता है, भाग्यविधाता नहीं।

तो जब प्रेम में मोह आ जाये तो वो प्रेम नहीं स्वार्थ बन जाता है। इसलिए प्रेम को पास रखिये और मोह को दूर, क्योंकि जिससे प्रेम करते है उसका विकास नहीं रोका करते। राधे-राधे! 
 


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (14)

मनुष्य की “सोच” संसार का सबसे गहन या कहो सबसे कठिन भाव है। कब क्या होने के पश्चात ये मन क्या सोच बैठेगा ये कहना असम्भव है? और यही सोच कई बार हमारे मन में हीन की भावना ले आती है।

हम सदा हमसे ऊपर की श्रेणी के व्यक्तियों को देखते है, उनके जीवन का विश्लेषण करते है और फिर स्वयं को हीन समझ लेते है। इसके पास इतना धन है, उसके पास कितना बल है? और मेरे पास, मेरे पास कुछ भी नहीं। मैं कितना हीन व्यक्ति हूँ, संसार के लिए मैं कुछ भी नहीं हूँ। होता है ना ऐसा?

किन्तु ऐसा नहीं है, आपके पास भी बहुत कुछ है पलट के देखिये। किसी भूखे व्यक्ति को केवल एक रोटी मिल जाये तो भले ही दूसरों के लिए वो अन्न का दाना होगा किन्तु उसके लिए वो भोज से कम नहीं है।

इसलिए जब भी मन में हीन भावना जागे अपनों की ओर देखिये, उनकी ओर पलटिये आपको विश्वास हो जायेगा कि भले ही आप ये मानते हो कि इस संसार के लिए आप कुछ नहीं है।

कुछ लोगों के लिए आप सम्पूर्ण संसार है। तो जो आपका संसार है उसमे प्रसन्न रहना सीखिए। राधे-राधे!

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (15)

ग्रंथों में लिखा गया है कि यदि मनुष्य मौन रहना सीख ले तो उसकी अधिकांश समस्याएं स्वयं ही समाप्त हो जाती है और सत्य में मौन में बड़ी शक्ति होती है, बड़ा बल होता है।

किन्तु वो बल किस काम का जो समय आने पर आपके काम ही ना आये। क्या सदा मौन रहना उचित है? नहीं, इतिहास साक्षी है संसार में अधिक विपदायें इसलिए आयी क्योंकि समय पड़ने पर मनुष्य उसका  विरोध नहीं कर पाया, मौन रहा।

यदि मौन रहना शस्त्र है तो उसका सही समय पर उपयोग करना भी  आवश्यक है। यदि अकारण मौन रहोगे तो बुरे तत्व उसे सहमति समझ लेते है फिर धीरे-धीरे वो आपका स्वभाव बन जाता है, आपका अभ्यास हो जाता है और फिर आपका व्यक्तित्व एक साधारण से पाषाण की भांति बन जाता है।

अपनी वाणी का आवश्यकता पड़ने पर सदुपयोग कीजिये, वाणी को कब वश में रखना है और कब मौन नहीं रहना है इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है ये समझना कि उसे कब तोडना है? राधे-राधे!

 


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani (16)

जीवन में हम कई लोगों से मिलते है, आप भी ऐसे कई लोगों से मिले होंगे जिन्होंने स्वयं को असफल मान लिया हो, निराश हो चुके हो, जिन्होंने ये स्वीकार कर लिया है कि इस जीवन में उनसे कोई कार्य हो ही नहीं पायेगा, वो कुछ कर ही नहीं सकते, किसी कार्य के वो योग्य ही नहीं।

किन्तु ऐसा नहीं है, इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो योग्य नहीं है, कोई ऐसा अक्षर नहीं है जो किसी मन्त्र का भाग ना हो, कोई ऐसी जड़ी-बूटी नहीं है जो औषधि ना हो, कोई ऐसा विष नहीं है जो समय आपने पर अमृत ना बन जाए और इसी प्रकार कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं होता।

उसे अयोग्य बनाती है उसकी सोच। इसीलिए स्वयं को जानो, जान जाओगे कि आप क्या हो?

अपने अंतर्मन को जगाए आप देखेंगे कि जिस संसार की नींव ही बनी है “आशा” से उस संसार में निराशा, हताशा और हार जैसा कोई भाव अस्तित्व ही नहीं रखता। राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani ( 17)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

जब जब धरती पर पाप बढ़ता है, धर्म की हानि होती है तब-तब मैं आता हूँ। ये तो आप सब जानते है किन्तु क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों मैं इस धरा का जीव बन के ही अवतरित हुआ? क्यों मैं मनुष्य के रूप में आपके बीच में रहता हूँ? आज बताता हूँ।

संसार में पाप और पुण्य संतुलन में चलते है किन्तु जब पाप सीमा से आगे बढ़ जाता है, मुझे यहां आना ही होता है। कारण – कारण ये है कि आप मुझे भुला देते है, चौंकिये मत मैं आप ही में बसता हूँ, बस आप स्वयं के भीतर बसे परमात्मा को भूलने लगते है।

इसीलिए मुझे आना पड़ता है आपको ये बताने कि सारी शक्ति आप में ही समाहित है। पर आप क्या करते है?

मेरा सम्मान करते है, मुझे पूजते है, मुझसे शक्ति मांगने लगते है, भांति-भांति की इच्छाएं मेरे सामने रखते है। मुझे आपकी श्रद्धा से कोई आपत्ति नहीं है, मुझे आपत्ति है उस भाव से जो आपको दुर्बल बनाता है।

परमात्मा में श्रद्धा रखिये किन्तु स्वयं की आत्मा पर भी विश्वास रखिये। क्योंकि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप नहीं कर सकते।

हर नर में नारायण बसते है और हर नारी में लक्ष्मी। तो पहचानिये अपने भीतर के नारायण को और बदल दीजिये समय के इस चक्र को मुझे प्रसन्नता होगी कि मेरे अवतार लेने का वास्तविक प्रयोजन आपको समझ आया।

तो शंका त्याग कर शंकर बन जाइये अन्यथा कंकड़ के समान रहना होगा। राधे-राधे!

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani ( 18 )

कभी आपने सोचा है इस संसार में हम सबसे अधिक किससे जुड़े है? अब कोई कहेगा माता-पिता, कोई कहेगा मित्र, कोई कहेगा पत्नी, तो कोई कहेगा संतान।

नहीं, यदि इस संसार में हम किसी से जुड़े है तो वो है “समय।” समय ही हमारा भूत है, समय ही हमारा वर्तमान है और समय ही हमारा भविष्य और हम क्या करते है?

सबसे अधिक जुड़े समय को, सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति को हम नष्ट कर देते है। कोई भविष्य के ऊंचे सपनों को बुनता है, कोई बीते कल को कोसता है।

किन्तु तनिक सोचिये बीता कल आपके सोच-विचार करने से बदलने नहीं वाला और भविष्य के विषय में सोच-विचार करके यदि आप अपना वर्तमान नष्ट कर देते है, तो आपका भविष्य भी बीते कल की भांति ही होगा।

इसीलिए आज के विषय में सोचिये उसे उत्तम बनाये, आपका भूतकाल और आपका भविष्य अपने आप उत्तम हो जाएगा। राधे-राधे!

------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani ( 19 ) 


अक्सर आपके बड़े-बूढ़ों ने आपसे कहा होगा कि ये संसार दुःख का मूल है और ईश्वर भक्ति उस दोष से दूर जाने का मार्ग है।

किन्तु सोचिये यदि ये संसार दुःख का सागर होता तो क्या नियति आपको यहां जन्म लेने देती? क्या ईश्वर यहाँ पर अवतार लेते?

जब समस्याओं पर हमारा वश नहीं चलता, हम आरोप लगाते है इस संसार पे, यहाँ के लोगों पे, सोचते है कि काश वो यहाँ पर आया ही ना होता।

एक किसान बंजर धरती पर जाता है और अपने परिश्रम से उसे लहलहाते खेत में परिवर्तित करता है। एक दर्जी जिसके पास एक सामान्य सा वस्त्र आता है अपने परिश्रम से उसे एक सुन्दर वेश में परिवर्तित कर देता है।

आप भी परिश्रम कीजिये, ये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि आप किस संसार में आये? ये महत्वपूर्ण नहीं है कि आप यहाँ कैसे आये?

यदि कुछ महत्त्वपूर्ण है तो वो है कि जब आप गए तब आप इस संसार को कैसा छोड़ के गए तो ये सोच के जिये कि जो किसी के लिए नर्क है उसे किसी का स्वर्ग बना कर निकलोगे तो आपका जीवन और आपका संसार दोनों धन्य हो जायेंगे। राधे-राधे!


------------------------------------------------------------------------------

Radha Krishna Vani ( 20 ) 


हम सबको कभी ना कभी तो क्रोध आता ही है और आएगा भी। मनुष्य है, इन्हीं भावों से हम जुड़े है। किन्तु ये क्रोध क्यों आता है, कभी सोचा है आपने?

ये क्रोध तब आता है जब हमारे मन के अनुसार कुछ ना हो जैसे कभी कोई हमारी बात ना माने, या कभी हमें पराजय प्राप्त हो जाये।

किन्तु इन सारी परिस्थितियों में आधार एक ही है – कि कहीं ना कहीं, किसी ना किसी स्थान पर हम दुर्बल है। क्रोध जन्म लेता है हमारी दुर्बलता से और फिर वो हमारी सबसे बड़ी दुर्बलता बन जाता है।

यदि क्रोध को वश में ना रखा जाए तो “भ्रम” जन्म लेता है, यदि भ्रम को वश में ना रखा जाए तो विवेक “व्याग्र” होने लगता है और यदि व्याग्रता को वश में  ना किया जाए तो व्यक्ति का “तर्क” ही नष्ट हो जाता है, सोचने-समझने की शक्ति शून्य हो जाती है और फिर उस व्यक्ति का पतन हो जाता है।

इसीलिए अपने क्रोध पर वश में रखे और अपने मन को शांत होने के लिए कहे। राधे-राधे!

 


Read More.

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ